२०२२०७०२

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शक्तिशाली और विस्तारित होने का रहस्य

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शक्तिशाली और विस्तारित होने का रहस्य – प्रकाश नायक

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) सारी दुनिया के चिंतन का केन्द्रीभूत विषय बन गया है। संघ जहां धर्म, अध्यात्म, विश्व कल्याण और मानवीय मूल्यों की रक्षा करनेवालों के लिए शक्ति स्थल है, वहीं वह हिन्दू या भारत विरोधी शक्तियों के लिए चिंता और भय कम्पित करनेवाला संगठन भी है। विश्व के सबसे बड़े संगठन के रूप में ख्यात, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), सन १९२५ में विजयादशमी के दिन नागपुर में स्थापन हुआ। पराधीन भारत में जन्में इस संगठन के विस्तार की राह आसान नहीं थी। संघ को रोकने के लिए विरोधी पग-पग पर कांटें बोते रहे पर वे संघ के संगठन शक्ति को रोक नहीं पाए।

आखिर, संघ के मूल में ऐसी कौन सी शक्ति छिपी है जिसने उसे इतना बड़ा कर दिया कि आज वह दुनिया के बुद्धिजीवियों के ध्यानाकर्षण का केन्द्र बन गया है। यही प्रश्न संघ के प्रशंसकों, विरोधियों और शोधकर्ताओं के मन में उठता है। इसलिए इन प्रश्नों के उत्तर यदि चाहिए तो सबको संघ संस्थापक एवं आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के विचारों को उचित परिप्रेक्ष्य में समझना होगा, क्योंकि उन्होंने ही संघ की स्थापना की और उसका लक्ष्य निर्धारित किया। वास्तव में डॉ.हेडगेवार के संदेशों में ही छिपा है आरएसएस के शक्तिशाली और विस्तारित होने का रहस्य।  

स्वयं के उद्धार के लिए संघ की स्थापना

डॉ. हेडगेवार ने १३ अक्टूबर, १९३७ को विजयादशमी के दिन अपने प्रबोधन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के उद्देश्य को निरुपित करते हुए कहा था कि, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना केवल अपने स्वयं के उद्धार के लिए ही किया गया है। संघ का कोई दूसरा-तीसरा उद्देश्य न होकर केवल स्वयं का उद्धार करना, यही उसकी इच्छा है। परन्तु स्वयं का उद्धार कैसे होगा, पहले हमें इसपर विचार करना होगा। स्वयं का उद्धार करने के लिए जीवित रहना पड़ता है, जो समाज जीवित रहेगा वही समाज स्वयं का और अन्यों का उद्धार कर सकता है और संघ की स्थापना इसी के लिए हुआ है। हिन्दू समाज जीवित रहे अथवा सर्व्हायव्हल ऑफ द फिटेस्टइस तत्व के अनुसार जीवित रहने योग्य रहे इस उद्देश्य से ही संघ का जन्म हुआ है।

डॉ. हेडगेवार के इस आहवान को स्वीकार कर अनेकों ने संघ कार्य के लिए अपने जीवन को समर्पित किया, जिनमें श्रीगुरूजी गोलवलकर, बालासाहब देवरस, एकनाथ रानडे, भाउराव देवरस, यादवराव जोशी, दादा परमार्थ, बाबासाहेब आपटे तथा माधवराव मुले आदि महानुभाव प्रमुख थे।

आक्रान्ताओं को दोष न दें

डॉ. हेडगेवार ने कहा, “हिन्दू राष्ट्र पर अतीत में अनेक आक्रमण हुए, वर्तमान में भी हो रहे हैं और कदाचित भविष्य में भी ऐसा होता रहेगा, यह संघ जानता है। संघ को यह भी मालूम है कि दूसरे समाज पर जो समाज आक्रमण करता है, दूर से देखनेवाले लोग उन्हें दोष देते हैं और जिनपर आक्रमण होता है उसके प्रति सहानुभूति रखते हैं। पर ये उनकी दृष्टि से ठीक है। अब जिनपर आक्रमण होता है उस समाज ने आक्रान्ताओं को दोष देते बैठे रहने के बजाय, ये आक्रमण क्यों होते हैं, इसके कारणों को खोजकर उसे दूर करना चाहिए। यह दृष्टि सामने रखकर अपने हिन्दू समाज की ओर देखें तो ये अत्याचार व आक्रमण होने का मुख्य कारण हमारी दुर्बलता व नासमझी ही है। आज हिन्दू समाज इतना नासमझ हो गया है कि कोई भी आता है और अपने सनकी मिजाज से हिन्दू समाज पर मनमानी अत्याचार करता है। पर अभी भी हमें इसकी कोई चिंता नहीं होती तथा अपने असंगठित और बिखरेपन को दूर करने के लिए जैसा होना चाहिए वैसा प्रयास होता दिखाई नहीं देता, संघ को यह अच्छा नहीं लगता। हमें गुस्सा आता है, हिन्दुओं के इस तिरस्कृत मनोवृत्ति का, न कि हिन्दुओं का। क्योंकि वे अपने ही हैं और उनके उद्धार के लिए ही हमारा जन्म हुआ है। पर यह तिरस्करणीय मनोवृत्ति स्वयं की रक्षा न करने की वृत्तिमौजूद होने की वजह से हिन्दू समाज पर होनेवाले आक्रमण समाप्त होना संभव नहीं। संघ को हिन्दुओं की इस कमजोरी को निकाल बाहर कर इस पाप को धोकर निकलना है और इसलिए ही इस आसेतु हिमालय हिन्दुस्थान के प्रत्येक कोने में संघ की शाखाओं का मजबूत संजाल फैलाकर सम्पूर्ण हिन्दू समाज को संगठित, प्रबल और स्वरक्षणक्षम बनाना, यही यही संघ की इच्छा है।

प्रत्यक्ष काम करनेवाले लोग चाहिए

२९ अगस्त, १९३९ को लाहौर में संपन्न हुए अधिकारी शिक्षण वर्ग में डॉ. हेडगेवार ने अपने भाषण में संघ को अपेक्षित स्वयंसेवकों की योग्यता और गुण संवर्धन को लेकर महत्वपूर्ण बातें कही थी।

उन्होंने कहा, “संघ को प्रत्यक्ष काम करनेवाले लोग चाहिए। संघ के पास ऐसी कोई सत्ता नहीं कि किसी से काम करवा सके, न धन है जिससे तनखा दे सके। संघ का कार्य नैतिक बल से चलता है। वह किसी पर जबरदस्ती नहीं कर सकता। इसलिए नैतिक बल से ही लोगों को खींच कर आप संघ में ला सकते हैं। आपकी संख्या इतनी हो जानी चाहिए कि आप लोगों को आकर्षित कर सकें, उनके दिलों को मोह लें, अपने चरित्र के मोह से। आपके सम्बन्ध में लोगों के दिलों में प्रेम होना चाहिए। इस दृष्टि से आप आकर्षण का केन्द्र बनने की कोशिश करें। लोगों के अन्दर जो तकरार होती है, हमारे में न हो। आपको लोग आदर्श समझे। वह कहे कि नौजवान वह, कि जो संघ के स्वयंसेवक जैसा हो। उनके मन में ऐसा विचार हो कि मेरा छोटा भाई भी संघ में जाकर ऐसा बनें। संघ के स्वयंसेवक पर इस नाते सभी जवाबदारी है।

उन्होंने कहा, “आपके मन में विचार हो कि पढ़ना भी संघ का कार्य है, क्योंकि संघकार्य के लिए पढ़ना है। जितना ज्यादा पढ़ जाऊंगा उतना ज्यादा कार्य कर सकूंगा। आपका व्यवहार आदर्श हो। दूसरे लोगों को भी ऐसा बनाने की आपकी जिम्मेदारी है। संघ का काम करने के लिए आपको योग्य होना चाहिए, शरीर से, दिमाग से, सब ओर से। ताकतवर आदमी कमजोर से ज्यादा कार्य कर सकता है।   

प्रेम से प्रेम की वृद्धि

डॉ. हेडगेवार स्वयंसेवकों को प्रेम का महत्त्व बताते हैं। वे कहते हैं, लोगों को ऐसा प्रतीत होना चाहिए कि यह हमारे पास आए, बैठे, बातचीत करें। ऐसा नहीं कि आपको देखकर लोग दौड़े, छिपते फिरें। लोगों को आप प्रेम से देखें, तो लोग भी आपको प्रेम से देखेंगे। प्रेम से प्रेम की वृद्धि होती है।

उन्होंने कहा कि, मेरा सन्देश यही है कि आप ऐसे प्रेम और आदर्श की मूर्ति बनें कि लोग आपकी ओर खींचे आए। आपके हाथ के साथ किसी का हाथ भी लगे, आपके साथ कोई बात भी कर ले फिर वह आपको न भूल सके। ऐसी आपकी वाणी में मिठास हो। किसी पुरुष के आप सदगुण ग्रहण करें, साथ ही अपने प्रभाव से उसके दुर्गुण दूर करें।

डॉ. हेडगेवार स्वयंसेवकों को आत्मपरीक्षण की सलाह देते हुए कहते हैं कि, “आप कभी भी अपने को सर्वगुणसम्पन्न मत समझो, नहीं तो आपके सब गुण निरर्थक हो जाएंगे। आप रात को सोते समय विचार करें कि दिनभर मैंने क्या किया, क्या गलती की है, आगे क्या करना है। ऐसा सोचने से तथा करने से आप समाज के नेता बनेंगे और जाति का काम बहुत बढ़ा सकेंगे। 

डॉ. हेडगेवार राष्ट्र से जितना प्रेम करते थे, उतना ही प्रेम वे समाज व स्वयंसेवकों से करते थे। उनमें मनुष्य को देशकार्य के लिए समर्पित होने की प्रेरणा देने का अदभुत कौशल था। वे स्वयंसेवकों को मातृवत स्नेह करते थे, सलाह देते थे, प्रेरित करते थे। उनकी वाणी, चरित्र और कार्य में इतना सामर्थ्य था कि उन्होंने जिसके कन्धों पर हाथ रखा वे उनके साथ चलने लगे। उन्होंने जिसे पुकारा वे उनके हो गए। उन्होंने जिनको संघ के माध्यम से राष्ट्रकार्य में लगाया, उन सभी ने अपने ही तरह सैंकड़ों को तैयार किया, सैंकड़ों ने हजारों को तैयार किया, हजारों ने लाखों स्वयंसेवकों का जीवन गढ़ा। अब स्वयंसेवकों की तादात करोड़ों में हो गई है और ये स्वयंसेवक देश और दुनिया में समाज के उत्थान के लिए सेवाकार्यों के माध्यम से अपना कर्तव्य कर रहे हैं।

आज संघ के ही एक स्वयंसेवक श्री नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री हैं। उनके ही प्रस्ताव को मानकर हाल ही में २१ जून, को दुनियाभर में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवसमनाया गया। यह संघ के स्वयंसेवक के प्रस्ताव की वैश्विक मान्यता का अनुपम उदाहरण है।


२०२२०७०१

प्रमाण

 प्रमाण

कृष्णाजी नारायण आठल्ये

अतीकोपता कार्य जाते लयाला
अती नम्रता पात्र होते भयाला ।
अती काम ते कोणतेही नसावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे  ॥ १ ॥ 

अती लोभ आणी जना नित्य लाज
अती त्याग तो रोकडा मृत्य आज ।
सदा तृप्त नेमस्त सर्वां दिसावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ २ ॥ 

अती मोह हा दु:ख शोकास मूळ
अती काळजी टाकणे हेही खूळ ।
सदा चित्त हे सद्विचारे कसावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ ३ ॥

अती ज्ञान अभ्यासल्या क्षीण काया
अती खेळणे हा भिकेचाच पाया ।
न कष्टाविणे त्वा रिकामे बसावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ ४ ॥ 

अती दान तेही प्रपंचात छिद्र
अती हीन कार्पण्य मोठे दरिद्र ।
बरे कोणते ते मनाला पुसावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ ५ ॥

अती भोजने रोग येतो घराला
उपासे अती कष्ट होती नराला ।
फुका सांग देवावरी का स्र्सावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ ६ ॥

अती स्नेह तेथे अवज्ञा उदंड
अती द्वेष भूलोकीचे पंककुंड ।
अती मत्सरे त्वां कशाला कुसावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ ७ ॥

अती आळशी वाचुनी प्रेतस्र्प
अती झोप घे तोही त्याचाच भूप ।
सदा सत्कृतीमाजी आत्मा विसावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ ८ ॥

अती द्रव्यही जोडते पापरास
अती घोर दारिद्य्र तो पंकवास ।
धने वैभवे त्वां न केंव्हा फसावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ ९ ॥

अती भाषणे वीटती बुद्धिवंत
अती मौन मूर्खत्व ते मूर्तिमंत ।
खरे तत्त्व ते अल्पशब्दे ठसावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ १० ॥

अती वाद घेता दुरावेल सत्य
अती `होस हो' बोलणे नीचकृत्य ।
विचारे तुवा ज्ञानमार्गी घुसावे जर
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ ११ ॥ 

अती औषधे वाढवितात रोग
उपेक्षा अती आणते सर्व भोग ।
हिताच्या उपायास कां आळसावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ १२ ॥

अती दाट वस्तीत नाना उपाधी
अती शून्य रानात औदास्य बाधी ।
लघुग्राम पाहून तेथे वसावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ १३ ॥

अती शोक तो देतसे दु:खवृद्धी
अती मानतो हर्ष तो क्षूद्रबुद्धी ।
ललाटाक्षरां सांग कोणी पुसावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ १४ ॥ 

अती भूषणे मार्ग तो संकटाचा
अती थाट तो वेष होतो नटाचा ।
रहावे असे की न कोणी हसावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ १५ ॥ 

स्तुतीला अती बोलती श्वानवृत्ती
अती लोकनिंदा करी दुष्ट चित्ती ।
न कोणा उगे शब्द स्पर्शे डसावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ १६ ॥ 

अती भांडणे नाश तो यादवांचा
हठाने अती वंश ना कौरवांचा ।
कराया अती हे न कोणी वसावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ १७ ॥

अती गोड खाणे नसे रोज इष्ट
कदन्ने अती सेवणे हे कनिष्ठ ।
असोनी गहू व्यर्थ खावे न सावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ १८ ॥ 

जुन्याचे अती भक्त ते हट्टवादी
नव्याचे अती लाडके शुद्ध नादी ।
खरे सार शोधोनिया नित्य घ्यावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ १९ ॥ 

सदा पद्य घोकोनियां शीण येतो
सदा गद्य वाचोनियां त्रास होतो ।
कधी ते कधी हेही वाचीत जावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ २० ॥

रामदासस्वामींप्रमाणेच या कवितेत "भुजंगप्रयात"
वृत्ताचा  देदिप्यमान वापर केलेला दिसून येईल.
यातील तत्त्वसार सदा संजीवित आढळून येईल.