संघमित्र चंद्रगुप्त प्रौढ
चंद्रगुप्त प्रौढ शाखा टिळकनगर विद्यामंदिर टिळकनगर येथे ४० वर्षांपासून नियमीतपणे लागत आहे. या शाखेचे सर्व कार्यक्रम आणि संबंधित मजकूर सर्व स्वयंसेवकांना एकत्रित मिळावा म्हणून ही अनुदिनी तयार केलेली आहे.
२०२६०१२२
२०२३०७०७
एकात्मता स्तोत्र
ॐ
सच्चिदानन्दरूपाय नमोऽस्तु परमात्मने ।
ज्योतिर्मयस्वरूपाय
विश्वमाङ्गल्यमूर्तये ॥ १ ॥
प्रकृतिः
पञ्चभूतानि ग्रहा लोकाः स्वरास्तथा ।
दिशः
कालश्च सर्वेषां सदा कुर्वन्तु मङ्गलम् ॥ २ ॥
रत्नाकराधौतपदां
हिमालयकिरीटिनीम् ।
ब्रह्मराजर्षिरत्नाढ्यां
वन्दे भारतमातरम् ॥ ३ ॥
महेन्द्रो
मलयः सह्यो देवतात्मा हिमालयः ।
ध्येयो
रैवतको विन्ध्यो गिरिश्चारावलिस्तथा ॥ ४ ॥
गङ्गा
सरस्वती सिन्धुर्ब्रह्मपुत्रश्च गण्डकी ।
कावेरी
यमुना रेवा कृष्णा गोदा महानदी ॥ ५ ॥
अयोध्या
मथुरा माया काशीकाञ्ची अवन्तिका ।
वैशाली
द्वारिका ध्येया पुरी तक्षशिला गया ॥ ६ ॥
प्रयागः
पाटलीपुत्रं विजयानगरं महत् ।
इन्द्रप्रस्थं
सोमनाथः तथाSमृतसरः प्रियम् ॥ ७ ॥
चतुर्वेदाः
पुराणानि सर्वोपनिषदस्तथा ।
रामायणं
भारतं च गीता सद्दर्शनानि च ॥ ८ ॥
जैनागमास्त्रिपिटकाः
गुरुग्रन्थः सतां गिरः ।
एषः
ज्ञाननिधिः श्रेष्ठः श्रद्धेयो हृदि सर्वदा ॥ ९ ॥
अरुन्धत्यनसूया
च सावित्री जानकी सती ।
द्रौपदी
कण्णगी गार्गी मीरा दुर्गावती तथा ॥ १० ॥
लक्ष्मीरहल्या
चन्नम्मा रुद्रमाम्बा सुविक्रमा ।
निवेदिता
सारदा च प्रणम्या मातृदेवताः ॥ ११ ॥
श्रीरामो
भरतः कृष्णो भीष्मो धर्मस्तथार्जुनः ।
मार्कण्डेयो
हरिश्चन्द्र: प्रह्लादो नारदो ध्रुवः ॥ १२ ॥
हनुमान्
जनको व्यासो वसिष्ठश्च शुको बलिः ।
दधीचिविश्वकर्माणौ
पृथुवाल्मीकिभार्गवाः ॥ १३ ॥
भगीरथश्चैकलव्यो
मनुर्धन्वन्तरिस्तथा ।
शिविश्च
रन्तिदेवश्च पुराणोद्गीतकीर्तय: ॥ १४ ॥
बुद्धा
जिनेन्द्रा गोरक्षः पाणिनिश्च पतञ्जलिः ।
शङ्करो
मध्वनिंबार्कौ श्रीरामानुजवल्लभौ ॥ १५ ॥
झूलेलालोSथ चैतन्यः
तिरुवल्लुवरस्तथा ।
नायन्मारालवाराश्च
कंबश्च बसवेश्वरः ॥ १६ ॥
देवलो
रविदासश्च कबीरो गुरुनानकः ।
नरसिस्तुलसीदासो
दशमेशो दृढव्रतः ॥ १७ ॥
श्रीमत्
शङ्करदेवश्च बन्धू सायणमाधवौ ।
ज्ञानेश्वरस्तुकारामो
रामदासः पुरन्दरः ॥ १८ ॥
बिरसा
सहजानन्दो रामानन्दस्तथा महान् ।
वितरन्तु
सदैवैते दैवीं सद्गुणसंपदम् ॥ १९ ॥
भरतर्षिः
कालिदासः श्रीभोजो जकणस्तथा ।
सूरदासस्त्यागराजो
रसखानश्च सत्कविः ॥ २० ॥
रविवर्मा
भातखण्डे भाग्यचन्द्रः स भूपतिः ।
कलावंतश्च
विख्याताः स्मरणीया निरन्तरम् ॥ २१ ॥
अगस्त्यः
कंबुकौण्डिन्यौ राजेन्द्रश्चोलवंशजः ।
अशोकः
पुश्यमित्रश्च खारवेलः सुनीतिमान् ॥ २२ ॥
चाणक्यचन्द्रगुप्तौ
च विक्रमः शालिवाहनः ।
समुद्रगुप्तः
श्रीहर्षः शैलेन्द्रो बप्परावलः ॥ २३ ॥
लाचिद्भास्करवर्मा
च यशोधर्मा च हूणजित् ।
श्रीकृष्णदेवरायश्च
ललितादित्य उद्बलः ॥ २४ ॥
मुसुनूरिनायकौ
तौ प्रतापः शिवभूपतिः ।
रणजितसिंह इत्येते वीरा विख्यातविक्रमाः ॥ २५ ॥
वैज्ञानिकाश्च
कपिलः कणादः सुश्रुतस्तथा ।
चरको
भास्कराचार्यो वराहमिहिरः सुधीः ॥ २६ ॥
नागार्जुनो
भरद्वाजः आर्यभट्टो वसुर्बुधः ।
ध्येयो
वेंकटरामश्च विज्ञा रामानुजादयः ॥ २७ ॥
रामकृष्णो
दयानन्दो रवीन्द्रो राममोहनः ।
रामतीर्थोऽरविंदश्च
विवेकानन्द उद्यशाः ॥ २८ ॥
दादाभाई
गोपबन्धुः तिलको गान्धिरादृताः ।
रमणो
मालवीयश्च श्रीसुब्रह्मण्यभारती ॥ २९ ॥
सुभाषः
प्रणवानन्दः क्रान्तिवीरो विनायकः ।
ठक्करो
भीमरावश्च फुले नारायणो गुरुः ॥३०॥
संघशक्तिप्रणेतारौ
केशवो माधवस्तथा ।
स्मरणीयाः
सदैवैते नवचैतन्यदायकाः ॥ ३१ ॥
अनुक्ता
ये भक्ताः प्रभुचरणसंसक्तहृदयाः
अनिर्दष्टा
वीराः अधिसमरमुद्ध्वस्तरिपवः ।
समाजोद्धर्तारः
सुहितकरविज्ञाननिपुणाः
नमस्तेभ्यो
भूयात् सकलसुजनेभ्यः प्रतिदिनम् ॥ ३२ ॥
इदमेकात्मतास्तोत्रं
श्रद्धया यः सदा पठेत् ।
स
राष्ट्रधर्मनिष्ठावान् अखण्डं भारतं स्मरेत् ॥ ३३ ॥
॥ भारत माता की जय ॥
२०२३०५१९
॥ सार्थ एकात्मता स्तोत्र ॥
॥ एकात्मता स्तोत्र ॥
२०२३०२१३
२०२२१११०
केसरी गुहेसमीप मत्त हत्ती चालला
दुंदुभी
निनादल्या,
नौबती
कडाडल्या,
दशदिशा
थरारल्या ।
केसरी
गुहेसमीप मत्त हत्ती चालला, मत्त हत्ती चालला ॥ धृ ॥
वाकुनी
अदिलशहास कुर्निसात देवुनी ।
प्रलयकाल
तो प्रचंड खान निघे तेथुनी ।
हादरली
धरणि व्योम शेषही शहारला ॥ १ ॥
खान
चालला पुढे,
अफाट
सैन्य मागुती ।
उंट, हत्ती, पालख्याही रांग
लांब लांब ती ।
टोळधाड
ही निघे स्वतंत्रता गिळायला ॥ २ ॥
तुळजापुरची
भवानी माय महान मंगला ।
राउळात
अधम खान दैत्यासह पोचला ।
मूर्ती
भंगली मनात चित्रगुप्त हासला ॥ ३ ॥
श्रवणी
तप्त तैल से शिवास वॄत पोहोचले ।
रक्त
तापले मनात खडग सिध्द जाहले ।
देउनी
बळी अजास तोशवी भवानीला ॥ ४ ॥
सावधान
हो शिवा! वैर्याची रात्र ही ।
काळ
येतसे समीप,
साध
तूच वेळ ही ।
मर्दण्यास
कालियास कृष्ण सज्ज जाहला ॥ ५ ॥
केसरी
गुहेसमीप मत्त हत्ती मारला, मत्त हत्ती मारला ।
दुंदुभी
निनादल्या,
नौबती
कडाडल्या,
दशदिशा
थरारल्या ।
केसरी
गुहेसमीप मत्त हत्ती मारला, मत्त हत्ती मारला ॥
कवी सुरेश देशपांडे, धरमपेठ, नागपूर.
खूप वर्षांनी पद्य म्हणण्याचा प्रयत्न केलाय. – माया ज्ञानेश देशपांडे
प्रतापगड,
१०-११-१६५९, अफजलखानवध #शिवप्रतापदिन,
१०-११-२०२२.
२०२२१०११
संघ युगाची पहाट
प
हाट झाली संघ युगाची विश्वासाने काम करु ।
पू ज्य
भाव तो ठेवून चित्ती भारतभूचे स्मरण करु ॥ धृ ॥
मो ल
देऊनी निज प्राणाचे देशासाठी जगू - मरु
ह
सतमुखाने सदैव आपण राष्ट्रासाठी कार्य करु ।
न
कोच आम्हा स्वार्थ भावना संघटनेची कास धरु
जी
वन सगळे संघासाठी आनंदाने दान करु ॥ १ ॥
भा
ग्य आमुचे थोरच म्हणुनी संघप्रवाही आलो
ग त
जन्माच्या पुण्याईने पावन आम्ही झालो ।
व
टवृक्षापरि देऊन छाया सकलांचा आधार ठरु
त
मा न आता परिश्रमाची ध्येय आपुले साध्य करु ॥ २ ॥
भारत माता की जय
प्रत्येक ओळीची अद्याक्षरे घेल्यास प.पू. मोहनजी भागवत असे वाक्य तयार होते.
सर्वं स्वयंसेवकाना ही कविता सादर अर्पण.
.....
उमाकांत
देशमुख,
पुणे.
.....
दि. ७
ऑक्टोंबर २०२२,
शुक्रवार.
२०२२०८०७
आर्त भक्तिने स्मरता केशव
स्फुर्तिगान-३७
आर्त भक्तिने स्मरता केशव, कोटि जीवन तुझ्यात विरतील ॥धृ॥
शांतहृदय तू विशाल सागर, चारित्र्याचा शुभ्र हिमाचल ।
आकाशाची तुझी भव्यता प्रसन्न जीवन गंगेचे जल ॥१॥
उदरी लाव्हा रसरसलेला, वरून पण ही क्षमाशीलता ।
त्यासम जीवन तुझे केशवा, उरात ज्वाला वरून शीतला ॥२॥
धुतले अमुचे मलीन जीवन, धर्मबिंदुचे शिंपुन तू जल ।
राष्ट्रभक्तिचे बीज पेरुनी, तूच फुलवली धरती शामल ॥३॥
कृतीचा धरला तू गोवर्धन, लावून त्याला कोटी बाहुबल ।
मातृभक्तिच्या सेतुवरुनी स्वर्ग जिंकण्या वीर धावतील ॥४॥
मातृमंदिरी धुंद होउनी लावुनि भाली मातृचरणधुल ।
कोटि मुखांनी तूच गर्जला, जय मृत्युंजय माता मंगल ॥५॥
भवितव्याच्या सागरातला स्तंभदीप तू निर्भय निश्चल ।
करोत कितीही आज उपेक्षा अखेर सारे तुलाच स्मरतील ॥६॥
तुझ्या स्मृतीने जीव तगमगे नेत्रांतुन जल निर्मळ खळते ।
कणाकणाने विरून व्हावे श्रद्धेया मी अंश तुझ्यातील ॥७॥
स्वयंसेवकों का यही एक सपना
स्वयंसेवकों का यही एक सपना ।
बने कार्यकर्ता बढे देश अपना ॥ धृ ॥
कोई श्यामवर्णी कोई गौर वर्णी
कोई शांतभावी कोई
क्रोधकर्णी ।
सभी मित्र बनकर करे काम मिलकर
कोई हो नवागत तो कोई पुराना ॥ १ ॥
न पूर्वाग्रही हो न
हो आत्मभावी
हृदय मन खुला हो विवेकी स्वभावी ।
विचारों में स्थिरता वचन में मधुरता
परायों व अपनों की निंदा से बचना ॥ २ ॥
उमंगी रहे हम उमंगी
हो साथी
गति भी रहे आपसी मेल खाती ।
अकेले ना हों हम यही ध्यान हरदम
कदम से कदम को मिलाकर ही चलना ॥ ३ ॥
हो चिंतन हमारा सदा
दूरगामी
मगर कार्यशैली हो एक एक कदमी ।
सभी काम भारी हो परिणामकारी
सफलता मिलेगी यही भाव भरना ॥ ४ ॥
वाचन मनन और अनुभव
कथन से
रखे अद्यतन ज्ञान बौद्धिक यतन से ।
सदा स्वस्थ हों और रहें व्यस्त भी हम
समयदान क्षमता बढाते ही रहना ॥ ५ ॥
२०२२०७०२
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शक्तिशाली और विस्तारित होने का रहस्य
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शक्तिशाली और विस्तारित होने का रहस्य – प्रकाश नायक
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) सारी दुनिया के चिंतन का केन्द्रीभूत विषय बन गया है। संघ जहां धर्म, अध्यात्म, विश्व कल्याण और मानवीय मूल्यों की रक्षा करनेवालों के लिए शक्ति स्थल है, वहीं वह हिन्दू या भारत विरोधी शक्तियों के लिए चिंता और भय कम्पित करनेवाला संगठन भी है। विश्व के सबसे बड़े संगठन के रूप में ख्यात, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), सन १९२५ में विजयादशमी के दिन नागपुर में स्थापन हुआ। पराधीन भारत में जन्में इस संगठन के विस्तार की राह आसान नहीं थी। संघ को रोकने के लिए विरोधी पग-पग पर कांटें बोते रहे पर वे संघ के संगठन शक्ति को रोक नहीं पाए।
आखिर, संघ के मूल में ऐसी कौन सी शक्ति छिपी है जिसने उसे इतना बड़ा कर दिया कि आज वह दुनिया के बुद्धिजीवियों के ध्यानाकर्षण का केन्द्र बन गया है। यही प्रश्न संघ के प्रशंसकों, विरोधियों और शोधकर्ताओं के मन में उठता है। इसलिए इन प्रश्नों के उत्तर यदि चाहिए तो सबको संघ संस्थापक एवं आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के विचारों को उचित परिप्रेक्ष्य में समझना होगा, क्योंकि उन्होंने ही संघ की स्थापना की और उसका लक्ष्य निर्धारित किया। वास्तव में डॉ.हेडगेवार के संदेशों में ही छिपा है आरएसएस के शक्तिशाली और विस्तारित होने का रहस्य।
स्वयं के उद्धार के लिए संघ की स्थापना
डॉ. हेडगेवार ने १३ अक्टूबर, १९३७ को विजयादशमी के दिन अपने प्रबोधन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के उद्देश्य को निरुपित करते हुए कहा था कि, “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना केवल अपने स्वयं के उद्धार के लिए ही किया गया है। संघ का कोई दूसरा-तीसरा उद्देश्य न होकर केवल स्वयं का उद्धार करना, यही उसकी इच्छा है। परन्तु स्वयं का उद्धार कैसे होगा, पहले हमें इसपर विचार करना होगा। स्वयं का उद्धार करने के लिए जीवित रहना पड़ता है, जो समाज जीवित रहेगा वही समाज स्वयं का और अन्यों का उद्धार कर सकता है और संघ की स्थापना इसी के लिए हुआ है। हिन्दू समाज जीवित रहे अथवा “सर्व्हायव्हल ऑफ द फिटेस्ट” इस तत्व के अनुसार जीवित रहने योग्य रहे इस उद्देश्य से ही संघ का जन्म हुआ है।”
डॉ. हेडगेवार के इस आहवान को स्वीकार
कर अनेकों ने संघ कार्य के लिए अपने जीवन को समर्पित किया,
जिनमें श्रीगुरूजी गोलवलकर, बालासाहब देवरस,
एकनाथ रानडे, भाउराव देवरस, यादवराव जोशी, दादा परमार्थ, बाबासाहेब
आपटे तथा माधवराव मुले आदि महानुभाव प्रमुख थे।
आक्रान्ताओं को दोष न दें
डॉ. हेडगेवार ने कहा, “हिन्दू राष्ट्र पर अतीत में अनेक आक्रमण हुए, वर्तमान में भी हो रहे हैं और कदाचित भविष्य में भी ऐसा होता रहेगा, यह संघ जानता है। संघ को यह भी मालूम है कि दूसरे समाज पर जो समाज आक्रमण करता है, दूर से देखनेवाले लोग उन्हें दोष देते हैं और जिनपर आक्रमण होता है उसके प्रति सहानुभूति रखते हैं। पर ये उनकी दृष्टि से ठीक है। अब जिनपर आक्रमण होता है उस समाज ने आक्रान्ताओं को दोष देते बैठे रहने के बजाय, ये आक्रमण क्यों होते हैं, इसके कारणों को खोजकर उसे दूर करना चाहिए। यह दृष्टि सामने रखकर अपने हिन्दू समाज की ओर देखें तो ये अत्याचार व आक्रमण होने का मुख्य कारण हमारी दुर्बलता व नासमझी ही है। आज हिन्दू समाज इतना नासमझ हो गया है कि कोई भी आता है और अपने सनकी मिजाज से हिन्दू समाज पर मनमानी अत्याचार करता है। पर अभी भी हमें इसकी कोई चिंता नहीं होती तथा अपने असंगठित और बिखरेपन को दूर करने के लिए जैसा होना चाहिए वैसा प्रयास होता दिखाई नहीं देता, संघ को यह अच्छा नहीं लगता। हमें गुस्सा आता है, हिन्दुओं के इस तिरस्कृत मनोवृत्ति का, न कि हिन्दुओं का। क्योंकि वे अपने ही हैं और उनके उद्धार के लिए ही हमारा जन्म हुआ है। पर यह तिरस्करणीय मनोवृत्ति –स्वयं की रक्षा न करने की वृत्ति– मौजूद होने की वजह से हिन्दू समाज पर होनेवाले आक्रमण समाप्त होना संभव नहीं। संघ को हिन्दुओं की इस कमजोरी को निकाल बाहर कर इस पाप को धोकर निकलना है और इसलिए ही इस आसेतु हिमालय हिन्दुस्थान के प्रत्येक कोने में संघ की शाखाओं का मजबूत संजाल फैलाकर सम्पूर्ण हिन्दू समाज को संगठित, प्रबल और स्वरक्षणक्षम बनाना, यही यही संघ की इच्छा है।”
प्रत्यक्ष काम करनेवाले लोग चाहिए
२९ अगस्त, १९३९ को लाहौर में संपन्न हुए अधिकारी शिक्षण वर्ग में डॉ. हेडगेवार ने अपने भाषण में संघ को अपेक्षित स्वयंसेवकों की योग्यता और गुण संवर्धन को लेकर महत्वपूर्ण बातें कही थी।
उन्होंने कहा, “संघ को प्रत्यक्ष काम करनेवाले लोग चाहिए। संघ के पास ऐसी कोई सत्ता नहीं कि किसी से काम करवा सके, न धन है जिससे तनखा दे सके। संघ का कार्य नैतिक बल से चलता है। वह किसी पर जबरदस्ती नहीं कर सकता। इसलिए नैतिक बल से ही लोगों को खींच कर आप संघ में ला सकते हैं। आपकी संख्या इतनी हो जानी चाहिए कि आप लोगों को आकर्षित कर सकें, उनके दिलों को मोह लें, अपने चरित्र के मोह से। आपके सम्बन्ध में लोगों के दिलों में प्रेम होना चाहिए। इस दृष्टि से आप आकर्षण का केन्द्र बनने की कोशिश करें। लोगों के अन्दर जो तकरार होती है, हमारे में न हो। आपको लोग आदर्श समझे। वह कहे कि नौजवान वह, कि जो संघ के स्वयंसेवक जैसा हो। उनके मन में ऐसा विचार हो कि मेरा छोटा भाई भी संघ में जाकर ऐसा बनें। संघ के स्वयंसेवक पर इस नाते सभी जवाबदारी है।”
उन्होंने कहा, “आपके मन में विचार हो कि पढ़ना भी संघ का कार्य है, क्योंकि संघकार्य के लिए पढ़ना है। जितना ज्यादा पढ़ जाऊंगा उतना ज्यादा कार्य कर सकूंगा। आपका व्यवहार आदर्श हो। दूसरे लोगों को भी ऐसा बनाने की आपकी जिम्मेदारी है। संघ का काम करने के लिए आपको योग्य होना चाहिए, शरीर से, दिमाग से, सब ओर से। ताकतवर आदमी कमजोर से ज्यादा कार्य कर सकता है।”
प्रेम से प्रेम की वृद्धि
डॉ. हेडगेवार स्वयंसेवकों को प्रेम का महत्त्व बताते हैं। वे कहते हैं, “लोगों को ऐसा प्रतीत होना चाहिए कि यह हमारे पास आए, बैठे, बातचीत करें। ऐसा नहीं कि आपको देखकर लोग दौड़े, छिपते फिरें। लोगों को आप प्रेम से देखें, तो लोग भी आपको प्रेम से देखेंगे। प्रेम से प्रेम की वृद्धि होती है।”
उन्होंने कहा कि, “मेरा सन्देश यही है कि आप ऐसे प्रेम और आदर्श की मूर्ति बनें कि लोग आपकी ओर खींचे आए। आपके हाथ के साथ किसी का हाथ भी लगे, आपके साथ कोई बात भी कर ले फिर वह आपको न भूल सके। ऐसी आपकी वाणी में मिठास हो। किसी पुरुष के आप सदगुण ग्रहण करें, साथ ही अपने प्रभाव से उसके दुर्गुण दूर करें।”
डॉ. हेडगेवार स्वयंसेवकों को आत्मपरीक्षण की सलाह देते हुए कहते हैं कि, “आप कभी भी अपने को सर्वगुणसम्पन्न मत समझो, नहीं तो आपके सब गुण निरर्थक हो जाएंगे। आप रात को सोते समय विचार करें कि दिनभर मैंने क्या किया, क्या गलती की है, आगे क्या करना है। ऐसा सोचने से तथा करने से आप समाज के नेता बनेंगे और जाति का काम बहुत बढ़ा सकेंगे।”
डॉ. हेडगेवार राष्ट्र से जितना प्रेम करते थे, उतना ही प्रेम वे समाज व स्वयंसेवकों से करते थे। उनमें मनुष्य को देशकार्य के लिए समर्पित होने की प्रेरणा देने का अदभुत कौशल था। वे स्वयंसेवकों को मातृवत स्नेह करते थे, सलाह देते थे, प्रेरित करते थे। उनकी वाणी, चरित्र और कार्य में इतना सामर्थ्य था कि उन्होंने जिसके कन्धों पर हाथ रखा वे उनके साथ चलने लगे। उन्होंने जिसे पुकारा वे उनके हो गए। उन्होंने जिनको संघ के माध्यम से राष्ट्रकार्य में लगाया, उन सभी ने अपने ही तरह सैंकड़ों को तैयार किया, सैंकड़ों ने हजारों को तैयार किया, हजारों ने लाखों स्वयंसेवकों का जीवन गढ़ा। अब स्वयंसेवकों की तादात करोड़ों में हो गई है और ये स्वयंसेवक देश और दुनिया में समाज के उत्थान के लिए सेवाकार्यों के माध्यम से अपना कर्तव्य कर रहे हैं।
आज संघ के ही एक स्वयंसेवक श्री
नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री हैं। उनके ही प्रस्ताव को मानकर हाल ही में २१
जून, को दुनियाभर में “अंतर्राष्ट्रीय
योग दिवस” मनाया गया। यह संघ के स्वयंसेवक के प्रस्ताव की
वैश्विक मान्यता का अनुपम उदाहरण है।
२०२२०७०१
प्रमाण
प्रमाण
कृष्णाजी नारायण आठल्ये
अतीकोपता कार्य जाते लयाला
अती नम्रता पात्र होते भयाला ।
अती काम ते कोणतेही नसावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ १ ॥
अती लोभ आणी जना नित्य लाज
अती त्याग तो रोकडा मृत्य आज ।
सदा तृप्त नेमस्त सर्वां दिसावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ २ ॥
अती मोह हा दु:ख शोकास मूळ
अती काळजी टाकणे हेही खूळ ।
सदा चित्त हे सद्विचारे कसावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ ३ ॥
अती ज्ञान अभ्यासल्या क्षीण काया
अती खेळणे हा भिकेचाच पाया ।
न कष्टाविणे त्वा रिकामे बसावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ ४ ॥
अती दान तेही प्रपंचात छिद्र
अती हीन कार्पण्य मोठे दरिद्र ।
बरे कोणते ते मनाला पुसावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ ५ ॥
अती भोजने रोग येतो घराला
उपासे अती कष्ट होती नराला ।
फुका सांग देवावरी का स्र्सावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ ६ ॥
अती स्नेह तेथे अवज्ञा उदंड
अती द्वेष भूलोकीचे पंककुंड ।
अती मत्सरे त्वां कशाला कुसावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ ७ ॥
अती आळशी वाचुनी प्रेतस्र्प
अती झोप घे तोही त्याचाच भूप ।
सदा सत्कृतीमाजी आत्मा विसावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ ८ ॥
अती द्रव्यही जोडते पापरास
अती घोर दारिद्य्र तो पंकवास ।
धने वैभवे त्वां न केंव्हा फसावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ ९ ॥
अती भाषणे वीटती बुद्धिवंत
अती मौन मूर्खत्व ते मूर्तिमंत ।
खरे तत्त्व ते अल्पशब्दे ठसावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ १० ॥
अती वाद घेता दुरावेल सत्य
अती `होस हो' बोलणे नीचकृत्य ।
विचारे तुवा ज्ञानमार्गी घुसावे जर
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ ११ ॥
अती औषधे वाढवितात रोग
उपेक्षा अती आणते सर्व भोग ।
हिताच्या उपायास कां आळसावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ १२ ॥
अती दाट वस्तीत नाना उपाधी
अती शून्य रानात औदास्य बाधी ।
लघुग्राम पाहून तेथे वसावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ १३ ॥
अती शोक तो देतसे दु:खवृद्धी
अती मानतो हर्ष तो क्षूद्रबुद्धी ।
ललाटाक्षरां सांग कोणी पुसावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ १४ ॥
अती भूषणे मार्ग तो संकटाचा
अती थाट तो वेष होतो नटाचा ।
रहावे असे की न कोणी हसावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ १५ ॥
स्तुतीला अती बोलती श्वानवृत्ती
अती लोकनिंदा करी दुष्ट चित्ती ।
न कोणा उगे शब्द स्पर्शे डसावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ १६ ॥
अती भांडणे नाश तो यादवांचा
हठाने अती वंश ना कौरवांचा ।
कराया अती हे न कोणी वसावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ १७ ॥
अती गोड खाणे नसे रोज इष्ट
कदन्ने अती सेवणे हे कनिष्ठ ।
असोनी गहू व्यर्थ खावे न सावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ १८ ॥
जुन्याचे अती भक्त ते हट्टवादी
नव्याचे अती लाडके शुद्ध नादी ।
खरे सार शोधोनिया नित्य घ्यावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ १९ ॥
सदा पद्य घोकोनियां शीण येतो
सदा गद्य वाचोनियां त्रास होतो ।
कधी ते कधी हेही वाचीत जावे
प्रमाणामधे सर्व काही असावे ॥ २० ॥
रामदासस्वामींप्रमाणेच या कवितेत "भुजंगप्रयात"
वृत्ताचा देदिप्यमान वापर केलेला दिसून येईल.
यातील तत्त्वसार सदा संजीवित आढळून येईल.
२०२२०६२६
हिन्दुराष्ट्र संघटकं सुजन वंदनीयम्
हिन्दुराष्ट्र संघटकं सुजन वंदनीयम् ।
केशवं स्मरामि सदा परमपूजनीयम् ॥धृ॥
राष्ट्रमिदं हिन्दुनां खलु सनातनम्
विघटनया जातं चिर दास्य भाजनम् ।
दुःखदैन्य पीडितमिति पीडित हृदयम्
केशवं स्मरामि सदा परमपूजनीयम् ॥१॥
भगवध्वज एवराष्ट्र गुरुरयं महान्
देशोयं खलु देवो जगति महियान ।
उपदिशन्तमिति सारं दृढमाचरणीयम्
केशवं स्मरामि सदा परमपूजनीयम् ॥२॥
वीरव्रतमेव परं धर्म निधानम्
सुशीलमेव लोकेस्मिन परम निधानम् ।
बोधयन्त मिति तत्त्वम् सततस्मरणीयम्
केशवं स्मरामि सदा परमपूजनीयम् ॥३॥
नेतुम् निजराष्ट्रमिदं परमवैभवम्
नयत विलयमंतर्गत सकल भेदभावम् ।
संघमंत्रमिति जपन्त मेकमेशनीयम्
केशवं स्मरामि सदा परमपूजनीयम् ॥४॥


